NDTV समेत पूरे मीडिया को खुला पत्र

आदरणीय मीडियाकर्मी मित्रों एवं गुरुजनों,

इस 5 नवम्बर 2016 को एक अलसाई कोहरे में लिपटी उनींदी सुबह में आपक सभी से मुख़ातिब होकर ये पत्र लिख रहा हूँ । कारण बताने की जरुरत तो नहीं है परन्तु फिर में पाठको की सरलता के लिए इसका उल्लेख करना जरुरी हो जाता है । ये खुला पत्र NDTV चैनल के प्रसारण पर 9 नवम्बर 2016 को लगी रोक के सन्दर्भ में है ।



कहाँ से शुरू करूँ समझ नहीं आता ।चलिए बात तब से शुरू करते है जबसे मैंने, एक साधारण भारतीय ने, सॅटॅलाइट चैनल से बरसते समाचार चैनलों का स्वाद चखा । सन 2000-2001 के आस पास की बात है, जब हम दूरदर्शन की न्यूज़ छोड़ कर अन्य चैनल पर खबर की पड़ताल तलाशने लगे ,क्योंकि हमे लगता था की हम तक वही खबरें छन कर पहुँच रही है जो सरकार चाहती है । देश दुनिया को जानने की जो भूख थी वो बराबर आप लोगों ने बुझाई । क्योंकि बचपन से पढ़ते आये थे एक दैनिक अखबार , तो अखबार में भी हम नए विकल्प तलाश रहे थे , साधारण पत्रकारिता से बोरियत होने लगे थी । उसी दौरान एक अन्य नया दैनिक अख़बार , बड़ी तेजी से विकल्प बन कर उभरा ।

सच ये था की हम को, जनता को खबर तो चाहिए थी पर मसालेदार तडके के साथ । आप सभी को अपने मन के भाव बताने से पहले, इस सच को हम सभी को कबूल करना होगा । इस सत्य को मानना होगा की हमे जिस तरह की भूख थी उसे ही समाचार चैनल बुझा रहे थे ।

अब मैं मुख्य मुद्दे पर आप सभी लोगो का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ । आँखों में सपने लिए जवान होते मेरे जैसे एक साधारण भारतीय युवा का लिए रविश कुमार से लेकर पुण्य प्रसून बाजपेयी हिंदी समाचार के जादूगर थे । शाम को रविश की आवाज़ समाज के उस तबके की कराह सुना देती थी जो अक्सर उपेक्षित रह जाती थी । वहीँ रात को पुण्य प्रसून जी की दस्तक हमारे दिमाग पर दस्तक दे देती थी । दीपक चौरसिया से लेकर बरखा दत्त से लेकर अंजना ओम कश्यप तक लाइव ख़बरों को हम तक पहुँचाने वाले सभी पत्रकारों से हम विशेष प्रभावित थे । कारण था, हमे वो दिखाया जा रहा था जो कपोल कल्पित नहीं था, जो धारणा नहीं थी, बल्कि एक ऐसी वास्तविकता थी जो शायद हम कभी नहीं देख पाते ।



उस दौर के लिए आप सभी का कोटि कोटि धन्यवाद!!

बचपन में सामाजिक विज्ञान में पढ़ा था की हमारे समाज के चार स्तम्भ है जिसमे सबसे आखिरी “प्रेस” सबसे जरुरी स्तम्भ है । और इन सभी स्तंभों की ख़ास बात ये थी की ये सभी किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए बिना, स्वतंत्र तौर पर अपनी राय रखते थे ।

परन्तु ये कहते हुए बड़ा दुःख होता है “ प्रेस” के साथ ऐसा हुआ नहीं । धीरे धीरे हमे ये एहसास होने लगा की जिस स्वतंत्र पत्रकारिता की ख़बरों को हम सराह रहे थे वो शायद किसी तरह के पूर्वाग्रह से ग्रसित थी । या फिर ये हो भी हो सकता है की राजनैतिक तौर पर हमे वो दिखाया गया जिससे हमारी पीढ़ी सही और गलत में बंटने की जगह दलों में बंटने लगी । और इसी में बंटने लगे आप लोग भी ।

आप लोगो ने ऐसे ऐसे लोगो को चैनलों पर बिठा कर वाद विवाद किये जो शायद किसी के लिए भी इतने जरुरी नहीं थे । पर क्योंकि उनकी TRP की कीमत थी इसीलिए वो भी दिखाया गया जो खबर थी ही नहीं । राष्ट्रीय चैनल होने की गरिमा धीरे धीरे खोती रही । आप और हम दलों और धड़ो में बंटते चले गए । मेरे दलित, लेफ्ट विचारधारा वाले मित्र एक चैनल देखने लगे और हम दूसरे, क्योंकि हमे अपने अपने पसंद के भोजन की तरह अपने अपने पसंद की ख़बरे मिल रही थी ।



क्यों आप निष्पक्ष खबर दिखाने से दूर होते चले गए ?

आप चाहे इसे माने या ना माने, इस पत्रकारिता के मार्ग में आप को निष्पक्ष होकर चलना था जो आप नहीं कर पाए । आप मुद्दों पर इतने भावुक हो गए की आपके पत्रकार या तो किसी राजनैतिक दल से जुड़ गए या फिर किसी आन्दोलन का हिस्सा बन उसकी अगुवाई करते दिखे । संवेदनशील मुद्दों पर आपने एक तरफ़ा पत्रकारिता करके दूसरे पक्ष के बोलने के सारे मौके ख़त्म कर दिए । ये एक कारण नहीं था । एक तबके के मानसिक और वैचारिक प्रेम के चलते दूसरे पक्ष के को इस हद तक उपेक्षित किया गया जहाँ वो वर्ग आपको खुल्ली गालियाँ देने लगा । और वो भी सोशल मीडिया पर जहाँ दुनिया आपको देख रही थी । उन्हें कोई जानता नहीं था पर आपको जानता था इसीलिए हानि भी आपकी ही हुई । ये अपमानजनक जितना आपके लिए था उससे कहीं ज्यादा हमारे समाज के लिए था ।

क्या इसे रोका नहीं जा सकता था ?

ठीक उसी तरह जिस तरह माँ बाप अपने बच्चों को सही और गलत का फर्क समझाते है , क्या आपकी जिम्मेदारी नहीं थी की आप सत्य दिखाते और सत्य का साथ देने के लिए कहते ? पर कैसे कहते ? आपके अपने अपने मीडिया घरों पर राजनैतिक और TRP का जबरदस्त दबाव जो था । 

आज ये हालात है के जब हम खबर देखते है तो हमे चैनल बदल बदल कर सबका खबर का वर्जन सुनना और समझना पड़ता है और फिर अपने हिसाब से उसका सार निकलना पड़ता है । रही बात अखबारों की तो उनमें हालत ये हो गए हैं कि विज्ञापनों के बीच कहीं कहीं खबर दिख जाती है ।



हालात इतने ख़राब है कि ऑनलाइन डॉटकॉम खबर प्रकाशित करने वाली वेबसाइट भी निष्पक्षता से कोसों दूर होती जा रही है ।

NDTV पर एक दिन के प्रसारण की जो रोक लगी है उसे सही कहने वाले लोगो के कल दिन भर से मेसेज आ रहे है । जो इसे गलत ठहरा रहे है वो अपने तर्कों के साथ पूरी तरह तैयार है । ये एक खेल बन के रह गया है आम जनता के लिए । 

हाँ आम से याद आया की आप लोगो ने wordplay इतना जबरदस्त किया की आम आदमी खुद को आम आदमी कहलाने से बच रहा है । भक्तो से लेकर अंधभक्तो तक शब्दों का दुरूपयोग किया गया । यदि एक राजनैतिक दल की विचारधारा को कोई मान ले तो क्या वो भक्त हो जाता था । बताइए ? इस हिसाब से तो हर दल के अपने अपने भक्त थे । क्या ये जरुरी था की उन्हें वर्ग विशेष में बांटा जाए ।

मैं जानता हूँ इस लेख के बाद मेरे कई मित्र जो की लेफ्ट, राईट और मध्य अलग अलग विचारधारों में गोते लगा रहे है, मेरी आलोचना भी करेंगे और प्रशंसा भी । परन्तु, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । मेरी लेखनी और मेरी राजनैतिक पसंद को जोड़ कर देखा जाएगा । परन्तु ये सब इतने जरुरी नहीं है जितना जरुरी ये सन्देश आप लोगो तक पहुंचना । न सिर्फ पहुंचना बल्कि आप लोगो को आत्ममंथन के लिए प्रोत्साहित करना ।

फर्क पड़ता है केवल एक ही बात से की हम आपसे गुजारिश करते है की हमे निष्पक्ष पत्रकारिता के उस युग में फिर से ले चलिए जहाँ सच और झूंठ अलग अलग थे । जहाँ पत्रकारिता का मुख्य कार्य देशहित में निष्पक्ष ख़बरे देना था । जहाँ सुबह ऐसी धुंधली और मटमैली नहीं थी । जहाँ सबका अपना अपना सत्य नहीं बल्कि सबका एक ही सत्य था । वर्ना वो दिन दूर नहीं जब इंसान के लिए फॉर्म में धर्म के साथ साथ आपके टीवी चैनल की भी जानकारी मांगी जायेगी । शादियों के रिश्ते के इश्तेहार में लिखा जाएगा की लड़की/लड़का फलां फलां न्यूज़ चैनल सुनता है ।

अंत में, बचपन से एक लाइन पढ़ते आया हूँ, उससे इस पत्र का अंत करूँगा ।

“ हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत ना हो पाऊं, परन्तु में आपके विचारों को व्यक्त करने के आपके अधिकारों की सदैव रक्षा करूँगा । “
-वाल्तेयर


आपका अपना
अंशुल माथुर

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About Anshul Mathur

Poet at heart, loves writing on socio-political issues, loves traditions cultures...believes in getting connected to roots

2 comments:

  1. agar baat nishpakshta ki hi hai toh yeh dekhiye...aur bataiye ...kya yeh sahi hai...
    https://www.thequint.com/news-videos/2016/11/04/qrant-dear-arnab-goswami-since-when-do-journos-manipulate-facts-during-the-news-hour

    kya ab sirf sarkaar ko bachaane waale, unki tareef karne waale hi sacche deshbhakt, sacche patrakaar hain...!!

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    Replies
    1. Amit bhai,

      Aap ki baat se sehmat hoon... Isiliye ye chitthi poore media ko likhi hai... Is gart mein koi ek nahi balki sabhi hai... Infact karan bhi hum log hi hai... Main sabhi se aagrah kar raha hoon ki kam se kam patrakarita ko nishpaksh rakhiye... Fir wo chahe koi channel ho ya koi individual...isse koi alag nahi hona chahiye... Arnab goswami bhi nahi.... Rahi baat deshbhakti ki to wo kisi ek vyakti ki nahi hai...adhikar hai aapka aur hamara koi ise humse cheen nahi sakta...isiliye iski chinta nahi hai..
      Ye pareshani do karano se khafi huyi hai jo hamari patrakarita ka hissa ban gaye hai
      1. Patrakarita tathyon ke aadhar par nahi balki bhavnao ke aadhar par ho rahi hai. agar bhavnao ke adhar par hi likhna bolna kehna sunna hai to fir kavi bane. Patrakarita to tathyo ke sipehsalaar taiyyar karti hai...bekhauf sipehsalaar..
      2. Rango se labrez kar jo utsaahpurna shaandaar coverage dikhane ki koshish ho rahi hai usme tathya peeche aur josh aage hai... Jo ki theek baat nahi hai.

      Khair ye ek lambi charcha ka vishya hai. Kabhi milenge to aapse is charcha ko aage badhayenge...

      Accha laga koi hai jo is mudde ki gravity ko samjh raha hai...

      Thanks

      Sincere Regards
      Anshul Mathur

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