ये उत्सव, ये उल्लास और ये दैत्य अहट्टास



मेरे सभी प्रिय पाठक मित्रों
 को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें!!




इस बार का दीपोत्सव हर बार के दीपोत्सव से अलग है। या यूं कहिये, शायद इस बार नज़रिया अलग है। खैर, जो भी हो ये दीपोत्सव अलग जरुर है । 

कैसे ?

आपके और हमारे लिए न सही ये दीपोत्सव उन परिवारों के लिए जरुर अलग होगा जिनके बेटे, भाई, पति उनके साथ नहीं होंगे । साथ नहीं होंगे, हाँ साथ नहीं होंगे। कुछ आसमान में सितारे बन चुके है और कुछ सीमा कर देश के लिए खड़े है। ताकि, आप और हम अपने स्वार्थ में डूब कर ये उत्सव और ये उल्लास मन सकें। 




आपके हमारे घरों में दीपक जले, इसलिए ऱोज, हर ऱोज कई घरों के दीपक बुझ रहे है।

मेरा ह्रदय मुझे इस तरह का उत्सव मनाने नहीं दे रहा। इसी पर कुछ पंक्तियाँ आप लोगो के समक्ष प्रस्तुत है। 

आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी ।

हाँ एक बात और, आज तक शायद आग्रह न किया हो, परन्तु आज जरुर करूँगा। यदि आपको मेरे ये भाव पसंद आये तो इसे जन जन तक जरुर पहुंचाए।




ये उत्सव, ये उल्लास और ये दैत्य अहट्टास



ये उत्सव, ये उल्लास और ये दैत्य अहट्टास

तुम को कैसे भा जाता है 

ह्रदय बरसता है मेरा ,मुझे पर और हर गोली पर 

जब पत्र, वीरगति का कोई आता है 

तुमको न आता होगा, न मुझको आता है 

न जाने क्यूँ फिर गला रुंध सा जाता है 



ये उत्सव, ये उल्लास और ये दैत्य अहट्टास

तुम को कैसे भा जाता है 

जब किसी माँ की आँखों में आसूं हो 

और मन पिता का छलनी हो 

और हो एक मांग, जो कभी अब न भरनी हो 

बच्चे हो उम्मीद के दामन पकडे 

और मन पर एक चोट, जो कभी न भरनी हो 

तो मैं कैसे खुद को बहलाऊँ,

कैसे मन पुलकित कर हर्ष में डूब सा जाऊँ



ये उत्सव, ये उल्लास और ये दैत्य अहट्टास

तुम को कैसे भा जाता है 

नहीं अभिलाषा मेरी की मैं उनकी यादों में कोई दीप जलाऊँ

हो सके यदि पूरा, तो मैं ये स्वप्न सजाऊँ

जो हुए देश पर न्योछावर, मै न्योछावर उन पर खुद हो जाऊँ

कैसे खा लूं में ये पकवान अब, कैसे अब घर पर हर्ष मनाऊँ

हैं भाई मेरे कुछ सरहद पर और कुछ ताबूतों में 

कुछ वीरों की बातों में और कुछ शत्रु की घातों में 

यदि उनके चरणों में मैं ये शीश चढ़ाऊ

तो ही है मुझको ये उत्सव का अधिकार 

वर्ना ये मन मेरा इस हर्ष भाव को खा जाता है 

ये उत्सव, ये उल्लास और ये दैत्य अहट्टास

तुम को कैसे भा जाता है 




सदैव आपका अपना

अंशुल माथुर






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About Anshul Mathur

Poet at heart, loves writing on socio-political issues, loves traditions cultures...believes in getting connected to roots

3 comments:

  1. AMAZING.... heartfelt. Way to go buddy!!

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  2. Thanks Bro.... Wrote what I and many around us felt..

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  3. A reality when people forget what happens during abd after war, while demanding for war.. फौजी कभी अकेला नहीं शहीद होता।

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