कश्मीर : स्वप्न से दुःस्वप्न तक


मन को विचलित सा कर दिया है। जी हां आपके और हमारे मन को। किसने? कश्मीर घाटी के हालातों ने। बहुत ही थका देने वाली मानसिक जद्दोजहद में उलझ कर रह गए है हम। एक तरफ हमारी देशभक्ति है जो हमे हर पल कश्मीर को हमारे देश का अभिन्न अंग होने का एहसास दिलाती है । और एक तरफ एक दूसरी विचारधारा है जो कहती है कि कश्मीर में जो हो रहा है उसकी जड़ हमारा पड़ोसी मुल्क नहीं हम खुद हैं। एक तीसरी विचारधारा है , जो इंगित करती है उस ओर जहाँ नफरत से सींची हुई एक पौध तैयार होती है हमारे देश की अस्मिता पर हर रोज़ हमला करने को। 

हालांकि आगे बढ़ने से पहले एक बात साफ़ कर दूं कि कश्मीर मुद्दे पर बुद्धिजीविओं की सोच समझ और ज्ञान के आगे हम शायद कमअक्ल और बेफकूफ नज़र आएं। पर सोच तो ऊपर वाले ने सभी को दी है। 


खैर जनाब, इन सभी तीनों विचारधारों के बीच सुलग रही है घाटी। कारण आप हम सभी जानते हैं। एक आतंकी बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद भड़की हिंसा ने घाटी की ओर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का आकर्षण खींच लिया है। वो आतंकी जो उभरते हुए जवां खून का पर्याय बन गया था घाटी में। मुद्दा दिमाग में और हाथ में हथियार लिए भारतीय सेनाओं को ललकारता हुआ एक नौजवान किसी नायक से कम नहीं था युवाओं के लिए। घाटी में हिजबुल का एक सिपहसालार बन सोशल मीडिया को हथियार बना कर लड़ने वाला गरीबों बेबसों का मसीहा बन, जो बात बात पर कश्मीर की आज़ादी की बात करता था।

  
जी हां कश्मीर की भारत से आज़ादी। और आज़ादी क्यों मांग रहा था ये और इसके जैसे कई लड़के? क्योंकि इन्हें लगता है कि भारतीय सेना ने इनके कश्मीर पर जबरन कब्ज़ा किया हुआ है। इन्हें बचपन से इनके बुजुर्ग ये बताते आये है कि कैसे कश्मीर इनका था और भारत ने उस पर कब्ज़ा किया हुआ है। हालाँकि वो ये बताना भूल जाते है कि उन्होंने खुद यहाँ के असल बाशिंदों को एक सर्द रात में कैसे बेघर कर दिया था। कश्मीर तब भी भारत का अभिन्न अंग था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा। अब सोचिये, यदि वो तीन लाख कश्मीरी पंडित आज के आज अपने परिवारों के साथ घाटी में मय हथियार उतर जाएं अपने घर वापस लेने, तब क्या हालत होंगे? आप किसके मानवाधिकार की बात करेंगे तब? आज जो रह रहे है उनके या फिर जो असल बाशिंदे थे उनके? सेना क्या करेगी तब, किस पर चलाएगी गोली?


जनाब 1980 के दशक से गोलियां बरस रही हैं कश्मीर में, लाखों कश्मीरी पंडित मर गए, बच्चे यतीम हो गए, औरतों की आबरू भरे बाजार लूटी गयी, तब कोई नहीं आया उनके लिए रोने। तब कहाँ गए थे मानवाधिकार? तीस साल से ज्यादा हो गए, कैंप में रहने को मजबूर कर दिया। नेता तो तब भी वही थे आज भी वही। फिर अचानक आज सेना की बन्दूक की गोली इतना दर्द क्यों दे रही है? या उस ज़माने में आतंकी गोलियों की जगह फूल बरसा रहे थे? या कहीं ऐसा तो नहीं की आतंक की एक नई रणनीति है, ये छाती कूटने के तमाशे।


साहब उन कश्मीरी पंडितों के बच्चों ने तो किताबें ही उठायी और हमारी सरकार ने उन्हें वही दी भी हाथ में। फिर कश्मीरी बच्चो के हाथ में बंदूके कहाँ से आ गयी?कौन है जो उन्हें बंदूकों और बमों की पढ़ाई करा रहा है? यक़ीनन भारत तो नहीं। जो हैं , वो आप हम जान रहे है, हमारा पड़ोसी मुल्क और उसके हमदम जो इस तरफ भारत में बैठे है। 

जायज़ तो ये भी होता की बेघर कश्मीरी पंडित अपना घर पाने के लिए हथियार उठाते और कब्ज़ा करने वालों को मार भगाते। पर ऐसा हुआ नहीं क्योंकि हम शांति पसंद लोग है। हमे बचपन से एक ही बात सिखायी गयी पर अधूरी:

अहिंसा परमो धर्म: 
धर्म हिंसा तथिव च:


अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है परंतु धर्म की रक्षा करने के लिए की गयी हिंसा उससे भी बड़ा धर्म है। पर हमें केवल पहली पंक्ति ही पढ़ाई गयी। कहीं हमारी शिक्षा पद्दति में ही तो कोई घुन नहीं लगा हुआ था, या फिर शायद शिक्षाविदों की नियत में कोई खोट थी।
दूसरी पंक्ति को पढ़ें तो फिर अपने देश-घर-परिवार की रक्षा करने से बड़ा धर्म क्या हो सकता है? ये सिद्धांत तो सभी पर लागू होता है फिर चाहे वो बेघर कश्मीरी पंडित हो या फिर भारतीय सेना। लेकिन फिर भी हमने हिंसा की शुरुआत नहीं की। 


पर कहते है कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है। उन बेघरों की आह में आज खुद के घरों में नजरबंद पड़े है दो कौड़ी के अलगाववादी । हमारी नानी कहा करती हैं जो खुद चोर होता है वो ज्यादा मजबूत ताले ढूँढा करता है खुद के घरों के लिए। वही हालात आज कश्मीर में है। अब अवाम में डर है कि कहीं हमने जैसे बेघर किया था, वैसे ही हम खुद भी बेघर न हो जाएं।


देखिये ये हार या जीत की लड़ाई नहीं है। ये लड़ाई है अपने डर को काबू पाने की जिसे हमारा पडोसी मुल्क भी लड़ रहा है और वही फितूर वो कश्मीर में भी भर रहा है। कही पढ़ा था अंग्रेजी में की अपने डर को जीतने के लिए आप को खुद डर बनना ही होगा (to conquer fear you must become fear), अर्थ आज समझ आ रहा है कुछ कुछ। 

खैर अगर बाहर के दुश्मन से लड़ना हो तो बात कुछ और ही है , यहाँ तो आस्तीन के साँपों की कोई कमी नहीं है। और गलती इन साँपों की नहीं जो कभी नेता, कभी पत्रकार, कभी प्रोफेसर और कभी छात्र के रूप में सड़कों पर रेंगते है। जी गलती हमारी ही है, हम देश के रूप में कुछ ज्यादा ही स्वच्छंदता दे देते है या फिर स्वच्छंदता की सीमा रेखा नहीं खींच पाते। एक हमला, किसी देश, चाहे फिर रूस हो या अमेरिका या फिर फ्रांस या फिर कोई और देश, कहीं भी हो जाए, देखिये मजाल है कि कोई मीडिया, नेता या कोई भी उस हमलावर के हितों की बात कर ले। पर यहाँ तो मूर्खों की फ़ौज रैली निकालेगी, बेफकूफों के कैमरे उन्हें टीवी पर दिखाएंगे, और गधे के बच्चे भीड़ का हिस्सा बनने पहंच जाएँगे। और सभी के सभी इस आस में कि इसी बहाने कोई राजनैतिक गलियारे का रास्ता खुल जाए।
स्वार्थ की रोटियां सेंकने के चक्कर में देश का बेड़ा ग़र्क करने पर तुले हुए है। आज कश्मीर, कल पंजाब, फिर हरियाणा, अरुणाचल, नागालैंड, एक काम कीजिये सारा देश थाली में परोस कर बेच दीजिये। 

ऐसा नहीं होता जनाब, और हम होने भी नहीं देंगे। अब आप भक्त कहिये हमें या अंधभक्त, फर्क नहीं पड़ता, देशभक्त तो है ही हम, और यक़ीनन आप जैसों से लाख दर्ज़े बेहतर हैं। 
आप कहते है सेना ज्यादती कर रही है, अगर ज्यादती कर रही होती तो बाढ़ से कौन बचा रहा था गए साल, पड़ोस से तो कोई नहीं आया था। और जो आप कर रहे है सेना के साथ वो बड़ा इन्साफ है? क्या उनके मानवाधिकार नहीं है कुछ? सर्दी गर्मी बरसात में वो आपके लिए मरते रहें और आप उन पर हमले करते रहें। 

कहने सुनने के लिए कागज़ कम पड़ जायेंगे पर वक़्त इज़ाज़त नहीं देता। ख़त्म करते करते एक गीत की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी। दूरदर्शन पर 90 के दशक में, जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था तब आया करता था ये गीत।
" दुश्मनों की बातों में आके, दोस्ती के रिश्ते भुला के खुद का घर जल दिया, हाय रे हमने ये क्या किया? "
काफी तलाश के बाद इंटरनेट पर मिला- प्यारा गुलशन अपना। इस गीत को फिर से टीवी पर दिखाने की जरुरत लग रही है। आप भी जरूर देखिएगा इन्टरनेट पर। 
खैर अपनी इन पंक्तियों के साथ अभी के लिए आप से इजाजत चाहता हूँ......




"यूँ धर्म को बदनाम न करो"


यूँ धर्म को बदनाम न करो, 
ताक़त दिखाने का खेल है, सब हम भी समझते हैं


यूँ दोस्ती के लिहाफ में खंजर मत रखो
ये सियासी खेल है, हम भी समझते हैं


जो मतभेद हो राय में तो बात नहीं कुछ, 
मनभेद नहीं चलते रिश्तो में 


ख्वाहिश ज़माने को जीतने की मत रखो,
दिल जीत लेना अपना शगल करो 


खून की नदियों से पेट नहीं भरेगा किसी का, 
नदियाँ दूध की बहाने की जिद बस करो 


बेवाओं की आह से कब भला हुआ है किसी का, 
किसी माँ के मन को कभी संभाल लिया करो 


दर्द के घाव भरते नहीं सदियों तक,
मल्हम मुस्कान से दिलों पर लगाया करो


सुकून की तलाश में सुकून छीन लेना किसी का, बड़ा काम नहीं,
जिंदगी के शोर को गले लगा दिल बहलाया करो


नस्लें न जाने कितनी बर्बाद हुई इस दीवानगी में,
कोशिश हो कि आने वाली पुश्तों को आबाद करो


यूँ धर्म को बदनाम न करो 
ताक़त दिखाने का खेल है सब हम भी समझते हैं



आपका अपना

अंशुल माथुर
Share on Google Plus

About Anshul Mathur

Poet at heart, loves writing on socio-political issues, loves traditions cultures...believes in getting connected to roots

5 comments: