बे-ख़्याल ज़िंदगी का हाल

अक्सर मैं अपने लेख कवितओं से ख़त्म करता हूँ, भावनाओं को संबल देने की कोशिश रहती है । ऐसा पहली बार हो रहा है कि कविता पहले लिखने में आ गयी और लेख बाद में लिख रहा हूँ । विषय नहीं ढूंढ पा रहा था, या यूं कहिये की विषय सामने था पर लिखने की इच्छाशक्ति बटोरने में समय लग रहा था । जिस जिंदगी के अगनित गतिशील आयाम हों , उस पर लिखने में वक़्त तो लगता ही है ।


जिंदगी और उस जिंदगी से जुड़े फलसफों पर मुझसे पहले कई लेखक उम्दा लेख लिख चुके हैं। सब अपने अपने नजरिये से जिंदगी के पहलु देखते हैं और दिखाते हैं। खैर जनाब, जिंदगी है क्या? किस चिड़िया का नाम है जिंदगी ? क्या जिंदगी वो है जो हमारे पुरखे या शायद उनके पुरखे जी गए ? या फिर वो जो हम जी रहे है या फिर शायद वो जो हमारी आने वाली पीढियां जिएंगी ?


खैर जिंदगी का मतलब ही जिन्दा होना है, केवल शरीर का नहीं बल्कि मन का, हिम्मत का जिन्दा होना है । हर इंसान अपने जीवन काल में कभी न कभी जिंदगी से जूझता है । किसी न किसी मोड़ पर हालत जिजीविषा को चुनौती देते है । पलट कर चुनौती को स्वीकार करने वाले महामानव बन जाते है और पीठ दिखने वाले इंसान, सिर्फ इंसान भर रह जाते है । जिंदगी केवल जीवन काल खंड में अस्तित्व होना भर नहीं है, जिंदगी तो हर उस पल में है जहाँ आप हर लम्हे को चुनौती देते हुए आगे बढ़ते हैं ।
इसी पर आधारित मेरी कृति आपके पठन के लिए आग्रहित है ।



बे-ख़्याल  जिंदगी क्या ख्याल है तेरा

बे-ख़्याल जिंदगी क्या ख्याल है तेरा, जो हाल है मेरा क्या वही हाल है तेरा,
ढूंढ रहा हूँ मैं खुद को तुझ में , क्या तू भी ढूंढ रही है खुद को मुझ में 

तेरी आहटों के असर से छुपा लेता हूँ मैं मेरी ख्वाहिशें अक़्सर
वाक़िफ हूँ मैं तेरी आदतों से , जैसे तुझे मेरी हसरतों की है ख़बर


अब्र जो है तेरी रूह में बरसने को बेताब अश्क बनकर
उन्हें रोक ले तेरे दामन में, उम्मीदें जाया न हो जाये तेरी कांच सी बिखर कर

तू मुझे कमज़ोर न समझना, मेरा ज़मीर मेरी रूह की परछाईं है
जो तू समझ रही है खुद को, वो बस मेरी की हुई हौसला-अफजाई है


मायूस है तू तेरे हालत से खबर है मुझे, मेरे हालात तुझसे बेहतर है शायद खबर हो तुझे
बे-ख़्याल जिंदगी क्या ख्याल है तेरा, जो हाल है मेरा क्या वही हाल है तेरा

हौंसलो की ईंटो से घर बनाता हूँ मैं, तू ताश के पत्तों का महल न समझा कर
तू गिर ले गिरा ले सौ बार, पाएगी खड़ा मुझे पहले से मज़बूत तू हर बार


जानता हूँ मैं , ये लम्हे, ये वक़्त, ये हालात सब तेरी है सरकार,
आजमाइश तू लाख कर ले मेरी, जीत मेरी ही होगी मुक़ाबले में हर बार

मैं मिटटी का नहीं मुक्क़दर-ए-हालातों का बना हूँ, तेरी कोशिशों के करम से
बिगाड़ लेगी क्या चंद मुश्किलों से मेरा कुछ, बाहर आ भी जा अब ऐसे भरम से


मैं चला अपनी मंजिलों की ओर , ये वक़्त का पहरा और ये मील का निशां ,अब ठहराव है तेरा
बे-ख़्याल जिंदगी क्या ख्याल है तेरा, जो हाल है मेरा क्या वही हाल है तेरा।

आपका अपना 
अंशुल माथुर 
चित्र संकलन के लिए विशेष आभार: श्री निहित गाँधी


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About Anshul Mathur

Poet at heart, loves writing on socio-political issues, loves traditions cultures...believes in getting connected to roots
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