अकेले चने ने भाड़ फोड़ दिया






भाग दो प्रकाशित करने में काफी वक़्त ले लिया है, ऐसा लगता है I मुंबई में आज इस शनिवार के दिन अपने कमरे में बैठ कर बारिश देख रहा हूँ I या यूँ कहिये कीआसमान से अमृत कैसे बरस के नालियों में बह रहा है वो देख रहा हूँ I हम बेबस हैं, लाचार भी है, नकारा और कामचोर भी हैं I जीवन की आस लगाये बैठे है, वर्तमान और भविष्य के भूत से मुंह छुपाये बैठे है I बचपन से सुनते आये है की महर्षि भागीरथी के तपस्या से माँ गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई I मानव कल्याण के हित के लिए ऐसी कई कहानियां और किस्से सुने बचपन में I सामाजिक सरोकार को प्राथमिकता देने के लिए कई महानुभाव पैदा हुए इस पावन धरा पर I

खैर जनाब, गर्मियों के मौसम में बे-पानी की एक फसल होती है , समाज सेवकों की फसल I गली, मोहल्ले, नुक्कड़ों पर बहुतायत में पाई जाती है ये फसल I पानी बचाने का सन्देश देते है मुर्दों के बीच, बड़ा मूर्खतापूर्ण लगता है ये सब I नाकारा लोग है सब , सब फ्लश चलाएंगे, शावर से नहायेंगे भी वो भी दिन में दो बार, आखिर मुर्दों की भी तो कोई निजी स्वच्छता होती है I जी हाँ जनाब मुर्दों के शहर बस गए हैं चारों और I जहाँ भरे दिन में चौराहे पर कोई मर जाये तो कोई देखने पूछने की जेहमत नहीं करता वो इनके कहने से पानी बचायेंगे, सोच के अजीब लगता है I कुछ मुट्ठी भर बेहोशी की नींद से उठेंगे रविवार के दिन और एक आध बोतल पानी की दान करके अगले दिन के अखबार में फोटो पा जायेंगे I आखिर मुर्दे भी सामाजिक जनचेतना का हिस्सा हैं I


सामाजिक जनचेतना से याद आया एक हैं राजेंद्र सिंह , विश्वविख्यात है “पानी बाबा” के नाम से I उजाड़, बंजर हो चुके राजस्थान के अलवर जिले के डार्क जोन घोषित किये जा चुके क्षेत्र को हराभरा कर डाला इन्होने I लोगो ने कहा एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता I साहब लग गए पुराने तालाबों को खोदने, जोहड़ों को सहेजने, बावडियों को सँभालने में I पहाड़ के किनारे किनारे तालाब खोद डाला, पानी के प्राकृतिक मार्ग में चेक डैम बना डाले I साठ साल से सूखी नदी में पानी आ गया और पांच नदियाँ फिर जी उठी I राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर के कई पुरूस्कार मिले और प्रयास फिर भी अनवरत जारी हैं I अकेले चने ने भाड़ फोड़ ही दिया आखिर I

इसी बीच पानी बाँट गया जाति में I पानी ऊंची जाति का और पानी नीची जाति का I कौन बताता किसे, की बड़ा बनने के लिए बड़प्पन चाहिए, जाति नहीं I पानी की कमी के चलते एक गाँव में साहब का आदेश हुआ की अब उनके कुएं से नीची जाती वालों को पानी नहीं मिलेगा I फिर क्या था एक मानव को जनहित पर ये कुठाराघात पसंद नहीं आया, सो अपने घर के बहार कोई चालीस दिन में कुआँ खोद दिया I घोषणा की , इस कुएं का पानी सभी धर्मं और जाति के लोगो के लिए है I साहब जाति बड़ी होती है की छोटी पता नहीं , पर मानवता सबसे बड़ी होती है ये पता चल गया I एक अकेला चना फिर भाड़ फोड़ गया I 


कबीर दास जी का दोहा याद आता है- 

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर |
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ||

हमारे राज्य राजस्थान में पानी पिलाने को सबसे बड़े पुण्य का दर्जा दिया गया है Iऔर पानी की कमी चलते पानी का बहुत महत्व है I आँखों के पानी का बहुत मान है I पनीली आँखे शर्म, लिहाज और गर्व का परिचायक मानी जाती रही है सदियों से I पर अब आँखों का वो पानी भी सूख रहा है I समाज के अंतर्मन का सूखा व्यवहार अब विचारों में झलक रहा है I हर व्यक्ति स्वार्थपरता के नित नए शिखर छूने को लालायित है I सब अच्छे काम के लिए एक दूसरे का मुंह ताक रहे हैं I पर इससे बात बनेगी नहीं I

इसी बीच, पिछले हफ्ते घर जाना हुआ, एक दैनिक अखबार- दैनिक भास्कर में खबर थी कि राजस्थान के शेखावाटी का इलाके में दुनिया में सबसे तेजी से जलस्तर घट रहा है या यूं कहिये की शायद ख़त्म होने की कगार पर है I पर ये इलाका शायद अकेला नहीं होगा, पृथ्वी पर मानव ने ऐसे कई इलाके बना दिए होंगे I पानी की कमी के चलते पलायन होंगे, गाँव के गाँव खाली होंगे I पलायन पानी वाले इलाको में होंगे, जहाँ जल संसाधनों पर और दबाव बढ़ेगा और उन्हें और शोषित किया जायेगा I फिर उन संसाधानो पर अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए मानव इतिहास के सबसे भीषण युद्ध होंगे I और ये सब कपोल कल्पित धारणा नहीं है, ये वह कड़वा सत्य है जिसका दंश हमे और हमारी आने वाली पीढ़ियों को झेलना होगा I 


हमे जल संरक्षण के लिए जल्द ही उपाय करने होंगे I मौसमी उपायों से फौरी राहत तो मिल सकती है पर लम्बे समय के लिए जरुरी कदम उठाने ही होंगे I केवल बारिश के पानी के संरक्षण या पानी कटौती से बात नहीं बनेगी I केवल गर्मियों के दस्तक देते ही हमे जलाशयों की याद आने की आदत से बचना होगा I सरकारों के साथ जनभागिता को जोड़ कर सालाना कार्यक्रम चलाने होंगे I पुरानी और नयी जल संरक्षण की पद्धतियों को जोड़ कर हमे अपने भविष्य का पुनर्निर्माण करना होगा, खुद का भागीरथी खुद को बनना होगा I अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब आपको अपनी आने वाली पीढ़ियों को मुहं दिखने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी क्यूंकि जब आप ही नहीं रहेंगे तो पीढ़ियाँ आएँगी कहाँ से ? जिन कामो का बहाना कर के हम अपनी अपनी जिंदगी में मशरूफ़ है, शायद किसी दिन उसी जिंदगी के लिए पानी ढूँढना एक काम बन जायेगा, जिन्दा रहने के लिए सबसे जरुरी काम I
रहीम दास की के इस दोहे का मतलब आज कुछ कुछ समझ आ रहा है -

“रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून I

पानी गए न उबरे, मोती, मानुष, चून I”



तू जीवन की झंकार है, जो न हो तो हाहाकार है

तू बहता अच्छा लगता था ,अब बूँद बूँद दरकार है

तू जीवन है तू सावन है,तू ही तो माँ का आँचल है

संगीत तू ही जब बहता कल कल है 

मैं स्वार्थपरता का मानव शिखर

जीवन के आस में पीता हूँ , तू है तो मैं जीता हूँ

तू अमृत बन करता जीवनदान, मैं नित करता हूँ अमृतपान

पर मैं स्वार्थपरता का मानवशिखर

मैं अपनी जड़ो को भूल गया, मैं कलजुगी झूला झूल गया 

मदमस्त हुआ अंधे विकास में,एक नए सवेरे की आस में 

काला भविष्य बुनता गया, मैं अपने कर्मों के फल चुनता गया

अन्धकार ने अब घेर लिया,जब होश हमे अब आया है 

न कोई राह दिखे न अब पुरखों का साया है

सदियों से हमने खुद यूँही भरमाया है,

देख हमारी दुर्दशा वर्तमान भी शरमाया है 

अब वक़्त, बदलने का भविष्य, इस लम्हे में आया है 

करता हूँ वादा अपने से मैं कोई जुगत लगाऊंगा

फिर से हरे खेत और बहते पानी के चित्र जीवंत कर लाऊंगा 

मैं स्वार्थपरता का मानव शिखर, जड़ो को लौट आऊंगा 

मैं स्वार्थपरता का मानव शिखर, जड़ो को लौट आऊंगा 


अंशुल माथुर 
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About Anshul Mathur

Poet at heart, loves writing on socio-political issues, loves traditions cultures...believes in getting connected to roots

6 comments:

  1. लिखते लिखते पानी की तरह तुम भी बह रहे थे कही , पर थमना नही , यूँ ही बहते रहो

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आपके शब्द हमारे उत्साह को बढ़ाते रहे ।
      आपका अपना
      अंशुल माथुर

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  4. I am proud you are my friend Anshul. Bhagwan teri kalam ko lambi umr de. Likho likhao, sabko dikhao, sabko jagao.

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    1. भाई बहुत बहुत आभार। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती•••• बस इन्ही पंक्तियों को चरितार्थ करने की कोशिश भर है ये लेखन। कोशिशों से सामाजिक जनचेतना की यदि एक लहर भी उठा पाये तो जीवन सफल हो जायेगा।

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