सूखा पानी



कलम सूख़ रही है शायद इन दिनों I गर्मी बहुत है I लिखने की कोशिश में कागज़ फट जाता है बार बार I पानी गीला होता था सुना और देखा था पर सूखा पानी पहली बार देख रहा हूँ I हर तरफ पानी पानी की पुकार मची हुई है I ऐसा पहली बार तो हो नहीं रहा I हर साल होता है ऐसा, सालों से, दशकों से या फिर शायद सदियों से होता रहा होगा I या कि थार रेगिस्तान वाले राज्य में पैदा होने कारण ऐसा सोचना मेरी पीढ़ी वालों के लिए आम बात होगी I

                                        


खैर, चारों तरफ जो हाहाकार मचा हुआ है पानी को लेकर उसे लेकर अच्चम्भित होता रहूँ या संवेदनशीलता दिखाऊँ समझ नहीं आता I हर साल गर्मी में कमोबेश यही हालात रहते हैं I देश की राजधानी दिल्ली से लेकर कानपुर तक, झांसी से लेकर जयपुर तक, सूरत से लेकर लातूर तक, या नागपुर से लेकर चेन्नई तक, लगभग हर राज्य, जिले, तालुका, जनपद, ग्राम में यही हालात रहते हैं I खैर, जनाब हालात भी वही हम भी वही, अपनी आदतों और नाकारापन से लाचार I दिखाई नहीं देता हमे दूर का अक्सरI दूरदर्शिता का अभाव में भविष्य के परेशानियों के भूलभुलैय्यओं का नव निर्माण करते चले जाते हैं हम, और उसे नाम दे देते है मानवजाति के विकास का I

                                          

तो बात हो रही थी पानी की, उसी पानी की जिस की जरुरत सबको है , जमीन को, पशुओं को, पक्षियों को, और स्वार्थपरता के महानायक मनुष्य को I परन्तु इस पानी को पाने के लिए मेहनत कोई नहीं करना चाहता I हाँ वो अलग बात है की उसी पानी पर राजनीति करने के लिए जबरदस्त मेहनत होती है I पंजाब और हरियाणा के बीच पानी की रार में नहरें पाट दी गयी या इंसानियत दफना दी गयी समझ नहीं आता I मध्यप्रदेश , राजस्थान, गुजरात के बीच पानी की लड़ाई कोई नयी नहीं है I दक्षिण भारत के भी हालात कुछ जुदा नहीं है I जनाब लड़ाई पानी की हो तो समझ भी आता है, लेकिन लड़ाई तो पानी से जुड़े वोटों की है I भैय्याजी ने केंद्र की भेजी हुई पानी की रेलगाड़ी वापस भेज दी I हालाँकि बाद में सूखे से निबटने के लिए अलग से पैकेज की मांग कर डाली, ये एक अलग बात है I जनता के लिए सूखे में पानी ज्यादा जरुरी है या फिर सरकार के लिए सूखे का पैकेज ये हमारी समझ से परे है I

                                       


हर कोई ये ऐतबार करना और करना चाहता है कि पानी की इस कमी से उसे या उसके परिवार को कभी नहीं जूझना होगा I और फिर इसी मुगालते को जिन्दा रखने भर के लिए दूरदर्शिता से परे कुछ कमज़ोर और लाचार कोशिशों की शुरुआत होती है I सामाजिक तौर पर सक्षम अपने घरों में बोरेवेल खुदवा कर जमीन की खोखली छाती को और निचोड़ते जाते हैं , मध्यमवर्गीय टंकियां या बाल्टियाँ भरते बैठते हैं, और गरीब सरकारी टैंकर की बाट जोहते हैं I हाँ उन्ही टैंकर की जिनके सालों से सफाई नहीं हो होती, पानी बोर का है की नाले का पता नहीं होता I जी हाँ उसी टैंकर की जिसे रसूखदार साहब के यहाँ पहले भेजा जाता है क्यूंकि उनकी क्यारी में लगे गुलाब बिन पानी के मुरझा रहे होते हैं I ग़रीबों का क्या है वैसे भी तो गंदे सन्दे पड़े रहते हैं I और अगर पीने के लिए पानी चाहिए तो थोडा इन्तेजार करेंगे भी तो, कौनसा मर रहे है बिन पानी के I और मर भी जाये तो किसे और क्या फर्क पड़ रहा है किसी गरीब के मरने से I

                                  



हाँ टैंकर से याद आया, जी ये पानी के टैंकर का खेल भी बड़ा मजेदार है I मुफ्त के पानी के दाम मिलते है I उसी पानी के जिस पानी को इस संसार के रचियता ने जमीन और हवा की तरह हर प्राणी के लिए मुफ्त बनाया था I पहले इंसान ने स्वार्थ में जमीन की कीमत लगायी और अब पानी के बारी है I पानी को लेकर अगला विश्वयुद्ध होगा सुना है I हो भी सकता है अब तो हवा भी पैसों से मिल रही है दुनिया में I 

इन सब के बीच मर रहा है बेचारा किसान I जी हाँ बेचारा था और बेचारा ही रहेगा I सबसे पहले अपने पाँव पर कुल्हाड़ी भी तो उसी ने मारी थी I जमीन के टुकड़े किये, फिर अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से धरती की प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता का नाश किया I यहाँ तक रुक भी जाता तो ठीक था, अपनी लोभ की क्षुधा शांत करने के लिए नकद फसलों की बुवाई की बिना ये जाने की उसके लिए जमीन ठीक है की भी नहीं या उस फसल के लिए पर्याप्त पानी मौजूद है या नहीं I परिणाम ये हो रहा है या तो बीज ही अंकुरित नहीं हो रहे या फिर पैदावार के सही दाम नहीं मिल रहे I या तो मिल रहा है सरकारी मुआवजा या फिर फसल बिकवाली से वो पैसे जिससे किसान खुद मौत खरीद रहा है I 

                                   


जी हुजूर किसान खेती कर रहा है, विधवाओं और अनाथों की खेती हो रही है आज कल हमारे गाँवों में I पर उनकी नम आँखों में भी पानी सूख रहा है अब I किसी मौत पर अब आंसू नहीं निकलते, पानी की बहुत कीमत हो गयी है जनाब I यही कीमत पहले जान ली होती तो ठीक रहता I पुरखों के बताये तरीकों को आजमा लेते तो शायद बच भी जाते I उन्ही के पुण्यों के प्रताप से जिन्दा है वरना कर्मों के हिसाब से तो पिछले पचास सालों में दुनिया का प्रगति के नाम पर बेडा गर्क करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है मानव जाती ने I हमारी पुरातन काल से चली आ रही परम्पराओं को रुढियों को नाम देकर विकास का जमा पहन तो लिया पर उन्ही परम्पराओं के वैज्ञानिक कारण जानने की कोशिश नहीं की गयी I 

                                       


हमारी कथाओं कहानियों में आज भी बेटियों के लिए पाठशालाओं के निर्माण, यात्रिओं के लिए विश्रामगृह और सरायों के निर्माण, कुएं और बावड़ी, प्याऊ आदि के निर्माण के लिए कहा जाता है I जनाब जिस सामाजिक सरोकार को हम कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी का नाम दिए बैठे हैं हमारे पुरखे उसे हमसे ज्यादा समझते थे और उसे फ़ैलाने के लिए उस समय के बेहतरीन माध्यमों का प्रयोग भी किया I पर हम सब भूल गए, नतीजा आज हम सब भुगत रहे हैं I अजी नित नए तालाबों या बावडियों के निर्माण न भी करते , अगर जो हमारे पुरखे बना गए थे उसे भी संजो लिया होता तो शायद दशा और दिशा कुछ और होती सामाजिक हालातों की I

जनसंख्या के बोझ तले माँ धरती को इतना दबा दिया है कि जिस धरती माँ की छाती से दूध बहा करता था आज वही धरती माँ अपने लालों के पालन पोषण करने में खुद को असमर्थ महसूस कर रही है I जिन पर भरोसा किया था वही सपूत आज अपनी माँ की छाती को छलनी किये बैठे हैं I और भूख ऐसी की जहाँ तीस फीट की गहराई पर पानी आ जाता था आज डेढ़ हजार फीट तक केवल खोखलापन है जमीन में और हवा है I पानी के प्राकृतिक मार्ग में जमीनों पर अधिकृत और अनाधिकृत तरीकों से कब्ज़ा करके आवासीय इलाके बसा लिए गए I और जब बारिशों में पानी अपने प्राकृतिक मार्ग पर चल निकला तब उसे बाढ़ का नाम देकर पानी को ही कठघरे में खड़ा कर दिया गया I­­­

                                    


इसी दौरान कुछ बदनसीब हम जैसे भी थे जिनके ­शहरों में इस समस्या से निजात पाने के लिए पानी का मार्ग बदला गया, नए मार्ग को नाम दिया गया डाईवर्जन चैनल I बिना ये जाने सोचे समझे की इसका पानी के प्राकृतिक जल पुनर्भरण के स्रोतों पर क्या असर पड़ेगा I इसी मूर्खतापूर्ण सामाजिक विकास कार्य के लिए कुछ महानुभाव जनप्रतिनिधियों ने विभिन्न सदनों में काफी वाहवाही लूटी I इस कृत्य पर उर्दू के मशहूर शायर शौक बहिराइची की ये पंक्तियाँ याद आ गई 

“बर्बादे गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा I “


...........जारी द्वितीय भाग में (यहाँ पढ़ें)

अंशुल माथुर 



Share on Google Plus

About Anshul Mathur

Poet at heart, loves writing on socio-political issues, loves traditions cultures...believes in getting connected to roots
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 comments:

Post a Comment