तुम क्यों जलाओगे मशाल मेरे लिए







आज देश में रोज होते बलात्कारों ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया, अछूता मेरा मन भी न रहा। और निर्भया ही क्यों, इस समाज में स्त्री के मन को जिस तरह से छलनी किया जा रहा है, आत्मसम्मान समाज का खो रहा है। निर्भया से लेकर मुरथल तक, हर रोज हर पल अपनी मानसिक कुंठाओं और अनुशासनहीनता की नित नए शिखर छुए जा रहे है। हम अपनी पीढ़ियों को वो बीमार समाज दे रहे है जिसका इलाज केवल सम्मान है। सम्मान एक स्त्री को पुरुष से और पुरुष को स्त्री से।

दुःख इन घटनाओ से तो होता ही है, दुःख का एक कारण हमारी बढती हुई संवेदनहीनता भी है!!

एक तरफ हमारे सामने निर्भया जैसे काण्ड होते है जिसपे सबकी नज़र होती है और एक तरफ अख़बार में छापी एक खबर भर होती है जो एक पन्ने से दुसरे पन्ने पे होती हुई गायब हो जाती है और बाकी रह जाता है सिर्फ दर्द भरा परिवार जिसे समाज की नज़र हर रोज मारती है।

ये रचना हमारे समाज को सवाल पूछ रही है की हमारे दायित्व और संवेदना क्या है और कहाँ तक।





तुम क्यों जलाओगे मशाल मेरे लिए।


तुम क्यों जलाओगे मशाल मेरे लिए
कि मैं तुम्हारी क्या लगती हूँ
तुम्हारी आग सिर्फ तुम्हारे सरपरस्तों के लिए है

कि मैं तुम्हारी बहिन हुई न बेटी
वैसे भी तुम्हारे रहनुमा शहरो में बसते है
वही जो देख कर मुँह फेर लेते है अक्सर
और फिर बंद कमरों में चर्चे करते है

जलाते हो जो मोमबत्तियां मेरी याद में
शायद तुम्हारी नाकामियां छुपाने का अंदाज़ है
याकि तुम बुझाने को बेताब हो मेरी यादें

हर पल जो घुट रही सिसक रही आवाज़ है
वो मेरी नहीं तुम्हारी खुद की है
बस जरा गौर फरमाने की तुम्हें दरकार है

मेरी आरज़ू नहीं क़ि मुझे याद करो उम्र भर
बस अपनी पुश्तों को काबू रखना
की अक्सर घर जलाती है ऐसी चिंगारियां

मत जलना कोई मोमबत्ती हम जैसों की याद में
कि कुछ शोले चाहिए अपनी चिता जलाने को
वैसे हम भी खुश है यहाँ दूर अपने हाल में

कि शोले तुम्हारे शहर की मशालों के लिए है
लफ्ज़ इंक़लाबी चार रातों के लिए है
छप गयी मेरी बर्बादी अब खबर बन कर
बाकी जो बचा वो तुम्हारी आबादी के लिए है

जब भी लगे तो जला लेना एक मशाल दिल में
मेरे लिए नहीं अपनी बेटियों के लिए
रोशन जहाँ मेरा न सही मुकम्मल उनका होगा

तब तलक जार जार हुई इज्जत को समेट लेना
अपनी मुट्ठियों में, लोहा बन ही जाएँगी एक दिन
शायद तब मशाल जल जाएं खुद ही, देख लेना




वैसे तुम क्यों जलाओगे मशाल मेरे लिए,
की तुम्हारे अंगार सुलगते है तुम्हारे सरपरस्तों के लिए,
ये मंज़र हम जैसों के, पड़ाव है तुम्हारे कारवाओं के लिए
कुछ अंगार बचा लेना फिर भी, अक्सर मोमबत्तियां जल जाती है अंगारों से।

अंशुल माथुर 

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About Anshul Mathur

Poet at heart, loves writing on socio-political issues, loves traditions cultures...believes in getting connected to roots

1 comments:


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