सुलगती चिंगारी धधकते शोले।




आज से ठीक 4 दिन पहले एक लेख लिखा था। पर वो छाप न सका, तकनीक की अति की भेंट हो गया वो। खैर, आज चार दिन बाद हालात कुछ और है और मौसम कुछ और।

सर्द रातें अब कुछ गर्म होने लगी है और गर्म होने लगा है समाज। वही समाज जिसमे आप और हम रहते हैं। पिछले कुछ दिनों की और देखता हूँ तो लगता है की क्या ये वही देश है जिसे हम दुनिया की एक नयी उभरती हुई ताकत के रूप में देखना चाहते हैं।

जी हाँ हम बात कर रहे हैं JNU काण्ड की। मुट्ठी भर छात्रों ने नारे लगा के राजनीति के गलियारों की हिलाया ही नहीं बल्कि देश की सोई हुई देश भक्ति भी को भी जगा दिया।हालांकि ये अलग बात थी की जिन कश्मीरियों के हितों की रक्षा की बात ये करना चाह रहे थे वो वही हैं जिन्होंने आज से 30 साल पहले एक सर्द रात में असल कश्मीरियों को उनके घरों से निकाल कर दरबदर की ठोकर खाने पर मजबूर कर दिया था।

दरअसल इस घटना ने देश में एक नयी फाल्ट लाइन तैयार की। लेफ्ट और राईट की। या यूँ कहिये की फाल्ट लाइन को उभार कर देश के पटल पर ला दिया। और इसी फाल्ट लाइन में सब बंट गए। छात्र, प्रोफैसर, वकील और यहाँ तक की मीडिया। वो मीडिया जिसकी नैतिक जिम्मेदारी निष्पक्ष होकर रिपोर्टिंग करना था।

इस दौर में जंग दरअसल देशप्रेमी और देश भक्तों के बीच लड़ी जा रही है। सब अपनी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने पर तुले हैं। अपना अपना पक्ष रखा जा रहा है। सत्य का पक्ष कोई नहीं रख रहा। जो देश प्रेमी है वो नारे लगा रहे हैं झंडे लेहराह रहे है। और जो देशभक्त हैं वो बर्फ की सफ़ेद चादर में आराम से सो चुके हैं या फिर देशविरोधी नारों के बीच देश में ही देश की रक्षा करते हुए जान दे रहे हैं।

कैसी अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात कर रहे हैं हम। गलत को सही और सही को गलत साबित करने की आज़ादी या फिर देश की अपमान जनक छवि प्रस्तुत करने की आज़ादी।
बेलगाम मीडिया और बिगड़ैल वकीलों को कानून हाथ में लेने की आज़ादी या फिर गुनहगारों को संरक्षण देने क आज़ादी।

चैनल ब्लैक आउट किये जा रहे है और वकील सड़कों पर डिस्को कर रहे है। अपनी रोटी सेंकते नेता भी है और टीआरपी और फुटेज के भूखे मौसमी प्रवक्ता भी। और अभिव्यक्ति की आज़ादी ऐसी की अपने आला हुक्मरानो की खींसे नीपोरने वाले सरेआम ऐसी उपमाओं का इस्तेमाल कर रहे है जिन्हें सुन कर आत्मा शर्मसार हो जाये। अभिव्यक्ति की आज़ादी कतई देश के सम्मान को ताक पर रख कर नहीं दी जा सकती।

बहरहाल देश के इस माहौल क लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाए समझ ही नहीं आता।
बात कर रहे है उस देश की जिसमें आज भी धारा 370 पर बहस नहीं की जा सकती। उस देश की बात कर रहे हैं जहाँ हरियाणा में जाट, राजस्थान में गुर्जर और गुजरात में पटेल आरक्षण के नाम पर हिंसा और लूट का ऐसा खेल खेलते है जिसमे हज़ारों करोड़ की सरकारी और गैर सरकारी संपत्ति को स्वाहा कर दिया जाता है।



और बात कर रहे है हम उस देश की जहाँ एक राज्य वाले दूसरे राज्य वालों को मार मार के भगा देते हैं। जिस देश में खुले आम एक राजनैतिक दल के लोगों को सिर्फ इसीलिए मार दिया जाता है क्योंकि वो विरोधी हैं उनकी राजनैतिक महत्वकांशा के। उस देश की बात कर रहे है जहाँ एक राज्य में कामगारों के हितों की रक्षा करने क नाम पर180 दिन से ज्यादा हड़ताल करवा कर देश की और कामगारों की प्रगति को रोका जाता है। जहाँ किसान क़र्ज़ के बोझ तले आत्महत्या कर लेता है और एक बड़ा व्यापारी वर्ग क़र्ज़ के पैसे को अपनी बपौती समझ कर आम आदमी पर ब्याज दर का बोझ डालता है।



आज़ादी के 69 साल बाद भी हम आधारभूत ढाँचे का विकास न करके वोटबैंक की राजनीति के लिए आरक्षण और दलित राजनीति की पौध तैयार कर रहे हैं।

ये हालात देश की दुर्दशा के नहीं बल्कि हमारी कुंठाओं और अनुशासनहीता के परिचायक है। आप और हम जो गलत को गलत नहीं बोलते और सही को गलत केवल इसीलिए कह देते है की हमे क्या फर्क पड़ता है।

इस काण्ड नें एक बात को सही साबित कर दिया क़ि कई दिनों तक कहा गया झूठ एक दिन सच हो जाता है।अफज़ल गुरु "जी" हो गए और लादेन साहब। अपनी तंग मानसिकता का परिचय न चाहते हुए भी दे दिया गया। छात्र वर्ग में पारंपरिक विचारधारा का विरोध करना एक शग़ल बन गया है जिसे राजनीति के गलियारों में सींचा जा रहा है। जो पौध तैयार होगी वो क्या करेगी भगवान् ही मालिक है। वैचारिक मतभेद होना एक सामान्य बात है पर देश की सामाजिक सरंचना के ऊपर प्रहार करना दूसरी।

समय रहते यदि हम नहीं चेते तो हो सकता है हैं एक ऐसे देश का स्वरुप देखने को मिले जिसकी झलक आप पिछले कुछ दिनों में देख चुके है। शायद ऐसा देश जिसके लिए आज़ाद भगत गांधी सुभाष पटेल ने अपनी जान नहीं दी थी।

हाँ और आखिर में बात सुलगती चिंगारी की और धधकते शोलों की। जनाब उनका काम है जलना तो जलने दीजिये आप को और हमे क्या फर्क पड़ता है जब तक हमारा दामन सुरक्षित है।




" मैं आज़ादी की वो मशाल लिए खड़ा हूँ जंग के मैदान में जिसके सरपरस्ती में है झुके आसमाँ शान में
सो जाओ तुम चैन से सो जाओ तुम आराम से
के जब नींद आएगी तो सो जायेंगे हम भी तिरंगे में आराम से
एक सुबह आएगी जब हम नहीं होंगे कहीं
और सूनी कोख उजड़ी मांग में फिर भी हम दिख जायेंगे
उस शाम में भी तुम सो जाना आराम में क्योंकि हम तब भी खड़े होंगे जंग के मैदान में
लिए वही मशाल अपने हाथ में जिसकी सरपरस्ती में झुके हैं आसमा शान में"

अंशुल माथुर 




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About Anshul Mathur

Poet at heart, loves writing on socio-political issues, loves traditions cultures...believes in getting connected to roots

4 comments:

  1. Very well written mathur ji....enlightment will soon encroach our minds with such incidents in the country....to see something good, our mind should know what bad looks like and these 'patrons' of the 'independence' are letting us know what bad is

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    1. Thanks for taking out time to share your valuable feedback.

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  2. Anshul My frnd.. You really take a deep dive in what's is currently going in our country...
    Good going..
    You should be economist..

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    1. dear reader,
      Thanks for taking out your valuable time to read the blog. I appreciate your views. However being economist is quite big thing to me. I happy writing at this point of time. Wish you a happy read in future.

      Regards
      Anshul Mathur

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